Poetry

Fakira

मै वफ़ाओं का मुन्तज़र
और जफ़ाओं का ये शहर
सच ही कहता था फ़क़ीरा
तेरा कुछ हो नहीं सकता

Uski AankheiN

उसकी आँखें जो ठहर जाती हैं
मेरी आँखों पर
मुद्दतों तक मुझे तन्हाई से निजात होता है

Wo AankhoN meiN Rahta bhi nahiN

वो आँखों में रहता भी नहीं
वो आँखों से बहता भी नहीं
वो ख़फ़ा है आँखों की नमी पर
वो आँखों को सहता भी नहीं

Meri AankhoN se

मेरी आँखों से पढ़ लिया करो
मेरे जज़्बात की हिकायतें
अल्फ़ाज़ कितने भी उलझे हों
लोग समझ ही जाया करते हैं

Iltijaa

कहाँ तक इल्तिजा की जाए
ये आरज़ू अब भुला दी जाए

हो गई आदत अंधेरों की
क्यों ना शम्मा बुझा दी जाए

Prashant V Shrivastava (Musafir)