prashant v shivastava

Tujh Dariya MeiN Utar Gaye

देखे तुम्हारे जलवे
अपनी हस्ती से मुकर गए
हम समंदर थे मगर
तुझ दरिया में उतर गए

Qaabil-e-Dushmani

लोग ऐसे हैं के कोई हमनशीं नहीं होता
आदमी की शक्ल में भी कोई आदमी नहीं होता
लौटा दिया जो आए थे दरखास्त लेकर
अब हर कोई तो काबिल-ए-दुश्मनी नहीं होता

Dhoop Ki RaunakeiN

उठ चुकीं हैं देख लो, धूप की रौनक़ें पहले ही
बची हुई रौशनी में, एक शाम कहो तो बना दूँ

Woh AankheiN

वो आँखें भुला दें कैसे कहो
किसी भी ग़ज़ल में उतरती नहीं

जो उठते हैं पलकों के परदे ज़रा
निशाने से पहले ठहरतीं नहीं

Khwaab Dekha Keejiye

फूलों से मिलिये
चाँद से बातें कीजिए
हक़ीक़त में सुंदर होते हैं
ख़्वाब देखा कीजिए

Khoobsurati Ki Intehaa

वो गहरी ज़ुल्फ़ों के छल्लों का उसके रुख़सार से खेलना
जन्नत की ख़ूबसूरती की इंतहा, इस मंज़र का क़तरा भर है

Tere Andaaz

मेरे अल्फ़ाज़ में
तेरे अन्दाज़ गर
शामिल ना होते

मुझे ख़यालों के
ये सब अहसास
हासिल ना होते