Qaabil-e-Dushmani

लोग ऐसे हैं के कोई हमनशीं नहीं होता
आदमी की शक्ल में भी कोई आदमी नहीं होता
लौटा दिया जो आए थे दरखास्त लेकर
अब हर कोई तो काबिल-ए-दुश्मनी नहीं होता

Aur Dil-e-bezaar

ऐ दिल-ए-बेज़ार तेरी, शिकायतें फिर सुन लूँगा अभी तो ज़िंदगी वाले, मसले ही हल नहीं हुए Aye dil-e-bezaar teri ShikaayateiN fir sun loonga Abhi to zindagi waale Masle hi hal nahiN huye